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बचपन की यादें रूठ गई है

 

 पहले आती थी बातों-बातों में, अब किसी बात पर नहीं आती।

रूठी वो हमसे इस कदर “सागर”, पहले बिस्तर पे जाते आती थी,

अब महज इंतजार करता हूं, बेवफा रात भर नहीं आती।

आँखों ही आँखों में अब रात गुजर जाती है,

मुर्गे की बांग पे अब तंद्रा टूट जाती है।

जाने कब दिन “वो” फिर से लौट आयेंगे

चिंता जायेगी हमारे मन से, भंवरे कानों में गीत गायेंगे।

हमको बचपन की कभी याद भी सताती है,

अपने गुरूवर की छड़ी सपने में डराती है।

मस्त बारिश में नहाते थे, खेत में जाकर,

पैर छूकर मुआफी मांगते थे, घर आकर।

अब तो घर में मेरे दिया है, ना ही बाती है,

आँखों ही आँखों में अब, रात गुजर जाती है।

सर्दियों में लगाना  दौड़, खूब रस्ते पर,

हमारा ध्यान कभी भी, रहा न बस्ते पर।

पहले अच्छी नहीं लगती थी “जो”, “वो” भाती है,

आँखों ही आँखों में, अब रात गुजर जाती है।

महफिलें सजती थीं, तो रात गुजर जाती थी,

बाग की हर कली, हसीन नजर आती थी।

गांव की हर गली, अपनी  कथी सुनाती है,

आँखों ही आँखों में अब, रात गुजर जाती है।

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दया शंकर मिश्र “सागर”

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