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भारतीय राजनीति में पुनरुत्थान की रणनीति के सात सूत्र – डॉ अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

भारतीय लोकतंत्र में कोई भी हार अंतिम नहीं होती। यहाँ जनता किसी दल को हमेशा के लिए खारिज नहीं करती, बल्कि समय-समय पर उसे आईना दिखाती है। इतिहास गवाह है कि जो दल इस आईने में खुद को ईमानदारी से देख लेता है, वही दोबारा सत्ता के शिखर तक पहुँचता है। कांग्रेस की 1980 की वापसी हो, तृणमूल कांग्रेस का वाम किले को ढहाना या आम आदमी पार्टी का दिल्ली में पुनरुत्थान, हर कहानी यही बताती है कि हार अपने आप में एक अवसर होती है। चूंकि चुनावी पराजय केवल सीटों का नुकसान नहीं होती बल्कि यह आत्मविश्वास को तोड़ती है, संगठन को कमजोर करती है और जनता के साथ बने विश्वास में दरार भी पैदा करती है। लेकिन यहीं से असली राजनीति शुरू होती है। हार के बाद सच्चाई को स्वीकार करना ही वापसी की पहली सीढ़ी है। जो दल अपनी गलतियों को मानने के बजाय उन्हें बाहरी साजिश या विरोधियों पर थोप देता है, वह उसी जगह ठहर जाता है।
– ईमानदार से आत्ममंथन
किसी भी हारी हुई पार्टी के लिए आत्ममंथन अनिवार्य है। 2014 में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद उसे खत्म मान लिया गया था, लेकिन पार्टी ने चुपचाप अपनी कमजोरियों को पहचाना और नेतृत्व, संगठन व संदेश, तीनों स्तरों पर काम किया। यह प्रक्रिया आसान नहीं होती, लेकिन बिना इसके कोई वापसी संभव भी नहीं होती। जनता की नाराज़गी को समझना और उसे स्वीकार करना ही बदलाव की नींव रखता है।
– नेतृत्व में ताजगी और विश्वसनीयता
राजनीति में चेहरे से ज्यादा भरोसा मायने रखता है। जब नेतृत्व जनता से कट जाता है, तो नए चेहरों की जरूरत बन जाती है। ममता बनर्जी इसका सबसे सशक्त उदाहरण हैं। उन्होंने आंदोलन, भावनात्मक जुड़ाव और जमीनी राजनीति के दम पर तृणमूल कांग्रेस को सत्ता तक पहुँचाया और दशकों पुराने वाम शासन को चुनौती दी। नेतृत्व में ताजगी पार्टी को नई ऊर्जा देती है और यह संदेश देती है कि बदलाव केवल शब्दों में नहीं, कामों में भी है।
– जनता से निरंतर संवाद
राजनीति संवाद की कला है लेकिन एकतरफा नहीं, दोतरफा। आम आदमी पार्टी ने यह सिद्ध किया कि जनता की बात सुनना ही सबसे बड़ी रणनीति है। मोहल्ला सभाओं से लेकर सेवा आधारित राजनीति तक, पार्टी ने यह दिखाया कि संवाद केवल भाषण नहीं, समाधान भी होता है। कहने का अर्थ है कि हार, बंद कमरों से बाहर निकलकर ही जीत में तब्दील हो सकती है।
– संगठन का पुनर्निर्माण
मजबूत संगठन के बिना कोई भी पार्टी लंबे समय तक नहीं टिक सकती। कार्यकर्ता किसी भी राजनीतिक दल की रीढ़ होते हैं। भाजपा की संगठनात्मक ताकत इसका उदाहरण है, वहीं कांग्रेस ने भी हाल के वर्षों में संगठन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की है। समझने वाली बात यह है कि हारी हुई पार्टी को कार्यकर्ताओं का मनोबल लौटाना होगा, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा और जमीन से जुड़े अभियान चलाने होंगे।
– विचारधारा की स्पष्टता और लचीलापन
राजनीति में विचारधारा पार्टी की आत्मा होती है। उससे भटकना पहचान खोने जैसा है, लेकिन समय के साथ उसे आधुनिक संदर्भों में ढालना भी जरूरी है। सीपीआई(एम) का बंगाल में पतन और केरल में प्रासंगिक बने रहना इसी संतुलन का उदाहरण है। कहने का अर्थ है कि मूल सिद्धांत कायम रहें, लेकिन उनके प्रस्तुतीकरण में समय की मांग बराबर झलके।
– गठबंधन और सहयोग की राजनीति
आज का दौर एकल-दल वर्चस्व का नहीं, बल्कि सामूहिक राजनीति का है। सही सहयोगियों के साथ गठबंधन कई बार हार को जीत में बदल देता है। हालांकि गठबंधन केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि साझा एजेंडा और आपसी सम्मान का अभ्यास होना चाहिए। हमने पिछले कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनावों में देखा है कि विश्वास के बिना बनी एकता टिकाऊ नहीं होती।
– युवा, महिलाएँ और डिजिटल रणनीति
कहना गलत नहीं होगा कि युवा और महिलाएँ आज राजनीति की धुरी हैं। उन्हें केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि नेतृत्व की नर्सरी समझना होगा। साथ ही डिजिटल तकनीक अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन गई है। सोशल मीडिया, डेटा और लक्षित संवाद के बिना आधुनिक राजनीति अधूरी है। आज के दौर में यह साफ़ है कि यदि कोई दल तकनीक से दूरी बनाए रखता है तो निश्चित तौर पर वह भविष्य से दूरी बना रहा है।
पराजय का मुंह देख रहे राजनीतिक दलों को यह भी समझना होगा कि जीत किसी एक फैसले पर नहीं टिकी होती। यह आत्ममंथन, संगठन, नेतृत्व, संवाद, विचारधारा और तकनीक, इन सभी के संतुलन से संभव होती है।

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