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पहली मोहर्रम को इस्लाम के दूसरे खलीफा की शहादत हुई

कानपुर , अमीरुल मोमिनीन हजरते सैयदना फारूके आजम रजि. के बारे में पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्ल इरशाद फरमाते हैं कि अगर मेरे बाद कोई नबी होता तो वह उमर होते, आप इस्लाम के दूसरे ख़लीफा भी ये पैगम्बरे इस्लाम इरशाद फरमाते हैं कि मैं बिला शुबह निगाहे नबूवत से देख रहा हूं कि जिन के शैतान और इन्सान के रौतान भी मेरे उमर के खौफ (डर) से भागते हैं। उक्त विचार अलफलाह एजूकेशनल व हेल्थ केयर सोसाइटी के तत्वावधान में आयोजित यौमे उमर फारुके आजम के जलसे को सम्बोधित करते हुए काजी-ए-शहर मुफ्ती साकिब अदीब ने कर्नलगंज, बरगद वाले मैदान में व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि इस्लाम को इतना फायदा किसी के ईमान लाने से नहीं पहुंचा जितना कि उमर फारुके आजम के ईमान लाने से पहुंचा, अदल व इन्साफ के पैकर थे हज़रत उमर फारुके आजम, इजरत उमर फारूके आजम रज़ि तआला अन्हु रातों को मदीने की गलियों में गश्त लगाकर लोगों की ख़बरगीरी किया करते थे, एक रोज आपका गुजर एक रास्ते से हुआ तो एक औरत रो रोकर कह रही थी कि काश हमारा शौहर भी जंग में गया होता तो मैं उसके साथ आराम कर रही होती, हजरत उमर फारूके आज़म उस औरत के यह जुमले सुनकर फौरन घर वापस आये। जलसे की सरपरस्ती काजी-ए-शहर मुफ्ती साकिब अदीब, अध्यक्षता कारी इकबाल और संचालन कलीम दानिश कानपुरी ने किया। प्रोग्राम के अन्त में स्वर्गीय मोहम्मद शाह आजम बरकाती के इसाले सवाब के लिये दुआ की गई। इस अवसर पर प्रमुख रूप से हाजी नूरुल हसन, महफूज आलम मसूरी, कारी सरफराज, मोहम्मद अरहाम मंसूरी, मोहम्मद शाकिर, मास्टर नौशाद आलम मंसूरी, मोहम्मद इरफान वेग, हाफिज व कारी इरशाद अहमद बरकाती खतीब व इमाम चूड़ी मोहाल मस्जिद कानपुर आदि उपस्थित रहे।

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