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दर्द की जड़ तक जाना क्यों जरूरी?

 

हम सब अपने जीवन की कहानी जी रहे हैं, कहानी अपनी-अपनी.. लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह समझने की कोशिश की है कि हमारी कहानी बार-बार एक जैसे मोड़ क्यों लेती है? क्यों कुछ रिश्ते हर बार टूट जाते हैं? क्यों सफलता सामने आकर भी हाथ नहीं आती और किनारे तक आकर सरक जाती है? क्यों एक अनजाना डर हमें भीतर से हमेशा-हमेशा जकड़े रखता है?
यही सवाल उठाते हैं हितेश छाबरा, जो अपने मंच विघ्नहर्ता- हीलिंग एंड पास्ट लाइफ रिग्रेशन्स के माध्यम से लोगों को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि जीवन की समस्याएँ सिर्फ सतह पर दिखाई देने वाली घटनाओं तक ही सीमित नहीं होतीं, बल्कि उनकी जड़ें कहीं गहराई में होती हैं।

समस्या नहीं, संकेत है
हम अक्सर अपनी तकलीफों को बदकिस्मती कहकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन क्या हो यदि हम उसी तकलीफ को एक संदेश मानकर उसे स्वीकार करने लगे? हर दर्द, हर असफलता, हर टूटन हमें कुछ दिखाना चाहती है। जब कोई रिश्ता बार-बार एक जैसे कारणों से खत्म होता है, तो शायद सवाल सामने वाले से ज्यादा खुद से पूछने की जरुरत होती है।

हम अपने जीवन में सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि हम हमेशा लक्षण ठीक करने में ही लगे रहते हैं, हमारा ध्यान कभी जड़ खोजने पर जाता ही नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं कि जैसे सिरदर्द की गोली खाकर राहत मिल जाती है, लेकिन असली कारण जस का तस रहता है, ठीक वैसे ही भावनात्मक घाव भी अंदर ही अंदर जमा होते रहते हैं।

भीतर की यात्रा सबसे कठिन, लेकिन सबसे सच्ची
बाहर की दुनिया से लड़ना आसान है, सबसे अधिक कठिन यदि कुछ है, तो खुद से मिलना। अपने डर को पहचानना, अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करना, अपने भीतर दबे अपराधबोध या क्रोध को देख पाना, यही असली साहस है। जब इंसान खुद को समझने की यात्रा पर निकलता है, तब उसे एहसास होता है कि वह परिस्थितियों का शिकार नहीं, बल्कि अपने अनुभवों का विद्यार्थी है। हर अनुभव उसे गढ़ रहा है, तोड़ नहीं रहा।

बदलाव की शुरुआत स्वीकृति से
हम सब चाहते हैं कि जीवन बदल जाए और किसी नदी की तरह एक प्रवाह में बहता रहे। लेकिन, बदलाव तब शुरू होता है, जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि “हाँ, मुझे अपने भीतर झाँकना होगा।” दर्द से भागने से वह खत्म नहीं होता, बल्कि उसे समझने से वह हल्का होता है।
यदि आज आप खुद को उलझा हुआ महसूस कर रहे हैं, तो इसे अंत मत मानिए। हो सकता है यह वही बिंदु हो, जहाँ से आपका वास्तविक रूप सामने आने वाला हो। जैसे अंधेरा रात का अंत नहीं, सुबह की तैयारी है, वैसे ही जीवन की कठिनाइयाँ भी एक नए अध्याय की भूमिका होती हैं।

आप ही अपने विघ्नहर्ता हैं

सबसे प्रेरणादायक सच यह है कि कोई बाहरी चमत्कार आपकी कहानी नहीं बदलता, आपकी समझ बदलती है।
जब आप अपनी भावनाओं को पहचान लेते हैं, जब आप अपने पैटर्न को समझ लेते हैं, तब जीवन धीरे-धीरे नया आकार लेने लगता है।

अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि बदलाव किसी बड़े अवसर से आएगा, नई नौकरी, नया रिश्ता, नया शहर। लेकिन, इतिहास गवाह है कि सबसे बड़े परिवर्तन भीतर की स्पष्टता से शुरू हुए हैं। एक खिलाड़ी तब जीतता है, जब वह अपने डर को स्वीकार करता है, एक उद्यमी तब आगे बढ़ता है जब वह असफलता से भागना बंद कर देता है और एक इंसान तब परिपक्व होता है, जब वह यह मान लेता है कि उसकी प्रतिक्रियाएँ ही उसकी वास्तविक शक्ति या कमजोरी तय करती हैं।

हम अपने जीवन में बार-बार वही गलती दोहराते हैं, क्योंकि हम अपने भीतर बने पैटर्न को पहचान नहीं पाते। जब तक हम यह नहीं समझते कि हम किस डर से निर्णय ले रहे हैं अस्वीकृति का डर, अकेलेपन का डर, असफल होने का डर, तब तक हम परिस्थितियाँ बदलते रहेंगे, परिणाम नहीं।

इसलिए अगली बार जब कोई समस्या सामने आए, तो घबराइए मत। उसे तुरंत दुर्भाग्य का नाम मत दीजिए। एक पल रुकिए और खुद से पूछिए, “यह मुझे क्या सिखाने आई है?”, “क्या मैं भाग रहा हूँ या समझ रहा हूँ?”

ये सवाल ही आपकी दिशा बदल सकते हैं। याद रखिए, जीवन की रुकावटें आपको रोकने नहीं, आपको जगाने आती हैं। वे आपको यह दिखाने आती हैं कि आप जितना खुद को समझते हैं, उससे कहीं अधिक गहरे हैं।
जब आप अपने डर को पहचान लेते हैं, तो वह आपकी ताकत बन जाता है। जब आप अपने दर्द को स्वीकार कर लेते हैं, तो वह आपकी समझ बन जाता है। और जब आप अपने अनुभवों की जिम्मेदारी ले लेते हैं, तो वही क्षण आपकी आंतरिक स्वतंत्रता की शुरुआत बन जाता है।

विघ्न बाहर नहीं हैं। विघ्न वे अनजाने विश्वास हैं, जिन्हें हमने बिना परखे सच मान लिया। और विघ्नहर्ता भी बाहर नहीं है।
वह आपके निर्णय में है। आपकी जागरूकता में है। आपकी उस एक ईमानदार स्वीकृति में है, “अब मैं खुद से भागूँगा नहीं।” यही वह क्षण है, जहाँ आपकी कहानी सच में बदलना शुरू होती है।

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