आज के दौर में यदि आप राजनीति और विकास की चर्चा करें, तो जलवायु परिवर्तन यानी ‘क्लाइमेट चेंज’ को नजरअंदाज करना नामुमकिन है। कुछ साल पहले तक पर्यावरण के मुद्दे केवल एनजीओ या वैज्ञानिकों के सम्मेलनों तक सीमित थे, लेकिन अब यह भारत की मुख्यधारा की राजनीति और अर्थव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। देश ने 2070 तक ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, उसने न केवल उद्योगों बल्कि राजनेताओं के सोचने का तरीका भी बदल दिया है। अब चुनावी रैलियों और विधानसभाओं में केवल पुरानी बुनियादी सुविधाओं की बात नहीं होती, बल्कि ‘कार्बन क्रेडिट’ और ‘ग्रीनहाउस गैस’ जैसे तकनीकी शब्द भी सुनाई देने लगे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भविष्य की राजनीति वही करेगा, जो प्रकृति और प्रगति के बीच संतुलन बनाना जानता होगा।
भारतीय राजनीति के कैनवास पर नजर डालें, तो कई ऐसे चेहरे उभरते हैं जिन्होंने पर्यावरण नीति को एक नई दिशा दी है। पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखते हुए यह स्थापित किया कि विकास का मतलब प्रकृति का विनाश कतई नहीं है। उनके कार्यकाल में पर्यावरण कूटनीति को एक बौद्धिक गरिमा मिली। वहीं, वर्तमान में इस जिम्मेदारी को संभाल रहे भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में भारत आज दुनिया को ‘सस्टेनेबल लाइफस्टाइल’ का मंत्र दे रहा है। उनके प्रयासों से सौर ऊर्जा और रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में भारत एक ग्लोबल लीडर के रूप में उभरा है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे भी अपनी सनातनी परंपराओं और आधुनिक पर्यावरण नीतियों के बीच तालमेल बिठाने की पैरवी करते रहे हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण की रक्षा हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे कानून और जन-भागीदारी से मजबूत करना होगा।
राजनीति के इस बदलते स्वरूप में केवल दिल्ली के गलियारे ही नहीं, बल्कि राज्यों के दिग्गज भी सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने कार्यकाल के दौरान जिस तरह से बड़े ग्रीन प्रोजेक्ट्स और रिवर फ्रंट जैसे कार्यों को प्राथमिकता दी, वह बताता है कि क्षेत्रीय राजनीति में भी ‘इको-पॉलिटिक्स’ की जड़ें गहरी हो रही हैं। वहीं, अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा अपनी खास शैली में प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण पर चिंता जताते हुए इसे एक नागरिक आंदोलन बनाने की बात करते रहे हैं। इन दिग्गजों की सक्रियता यह साफ करती है कि अब ‘ग्रीन पॉलिटिक्स’ केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मजबूरी और जरूरत बन चुकी है।
दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के इस बदलते मिजाज को अब चुनावी रणनीतिकार भी भांप रहे हैं। इसी कड़ी में जाने-माने राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम का नाम भी चर्चा में आया है, जिन्होंने हाल ही में ब्यूरो वेरिटास जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था से कार्बन फुटप्रिंट और ग्रीनहाउस गैस अकाउंटिंग में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन हासिल किया है। हिंदी भाषी राज्यों की जमीनी सियासत और जनसंचार के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले डॉ. मलिकराम का इस तकनीकी क्षेत्र में प्रवेश करना एक बड़ा संकेत है। यह दर्शाता है कि आने वाले समय में चुनावी रणनीतियां केवल जातीय समीकरणों या लोक-लुभावन वादों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि राजनेताओं को यह भी सलाह दी जाएगी कि वे अपनी नीतियों को वैश्विक पर्यावरण मानकों के अनुरूप कैसे ढालें।
कुल मिलाकर देखें तो भारत जैसे विकासशील देश के लिए कार्बन क्रेडिट और सतत विकास अब केवल किताबी शब्द नहीं रह गए हैं। आने वाले दशकों में देश को ऐसे विकास मॉडल की दरकार होगी जो अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी बनाए रखे और धरती को रहने लायक बने रहने में भी मदद करे। जिस तरह से जयराम रमेश से लेकर डॉ. अतुल मलिकराम तक अलग-अलग भूमिकाओं में लोग पर्यावरण नीति और कार्बन इकोनॉमी की समझ विकसित कर रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि आगामी वर्षों में पर्यावरण और राजनीति का यह गठबंधन और भी गहरा होगा। वह दिन दूर नहीं जब जनता किसी नेता को उसके द्वारा लगाए गए पेड़ों और कम किए गए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर भी आंकेगी।


















