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गैस की लंबी लाइनें और बढ़ती चिंता के बीच, एलपीजी संकट के पीछे की सच्चाई!– डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

 

पिछले कुछ दिनों में देश के कई शहरों से एक जैसी तस्वीरें सामने आ रही हैं। कहीं लोग सुबह से गैस एजेंसी के बाहर लंबी लाइन में खड़े हैं, तो कहीं होटल और ढाबा चलाने वाले सिलेंडर के इंतजार में परेशान हैं। कुछ स्थानों से ऐसी दुखद खबरें भी सामने आईं कि घंटों लाइन में लगे रहने के दौरान बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ गई और कुछ मामलों में लोगों की मौत तक हो गई। इन घटनाओं ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। स्वाभाविक रूप से लोग पूछ रहे हैं कि आखिर अचानक गैस की इतनी कमी क्यों हो गई। दूसरी ओर विपक्षी दल सरकार से सवाल कर रहे हैं कि यदि हालात इतने गंभीर थे तो पहले से तैयारी क्यों नहीं की गई।

लेकिन इस पूरे मामले को समझने के लिए हमें थोड़ा व्यापक नजरिया अपनाना होगा। यह केवल भारत की समस्या नहीं है, बल्कि एक बड़े वैश्विक ऊर्जा संकट का असर है जो धीरे-धीरे कई देशों में दिखाई दे रहा है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दुनिया का ऊर्जा बाजार बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर निर्भर करता है। फरवरी 2026 के अंत में मध्य पूर्व में अचानक तनाव बढ़ गया। इजराइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले के बाद हालात तेजी से बिगड़े और जवाबी कार्रवाई में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। यह वही समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस गुजरता है। जब यह मार्ग प्रभावित हुआ तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव पड़ना स्वाभाविक था। कई देशों में तेल और गैस की आपूर्ति पर असर देखा गया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें भी अस्थिर हो गईं।

भारत पर इसका असर इसलिए भी पड़ा क्योंकि देश एलपीजी का बड़ा उपभोक्ता है। भारत में हर साल करोड़ों टन एलपीजी की जरूरत होती है और उसका एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका असर देश के भीतर वितरण व्यवस्था पर भी पड़ता है। इसी वजह से कई शहरों में गैस एजेंसियों पर भीड़ बढ़ गई और सिलेंडर मिलने में देरी होने लगी। खासकर व्यावसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति प्रभावित होने से होटल, रेस्तरां और छोटे खानपान व्यवसायों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

सरकार का कहना है कि संकट के समय सबसे बड़ी प्राथमिकता घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरत पूरी करना है। देश में करीब 33 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन हैं और कोशिश की जा रही है कि किसी भी घर की रसोई बंद न हो। इसी कारण कई जगहों पर व्यावसायिक सिलेंडरों की आपूर्ति अस्थायी रूप से कम की गई और घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता दी गई है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं और आयात के नए स्रोत भी तलाशे जा रहे हैं। सरकार का दावा है कि वैकल्पिक देशों से अतिरिक्त आपूर्ति मंगाने की प्रक्रिया भी तेज की गई है, जिससे आने वाले दिनों में स्थिति सामान्य हो सकती है।

हालांकि विपक्ष और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बड़े देश को ऊर्जा आपूर्ति के मामले में और बेहतर तैयारी करनी चाहिए थी। उनका तर्क है कि यदि वितरण व्यवस्था और स्थानीय प्रबंधन मजबूत होता, तो इतनी लंबी लाइनें और अफरा-तफरी की स्थिति शायद नहीं बनती।
सच्चाई शायद इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं है। एक तरफ वैश्विक परिस्थितियों का दबाव है, तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर व्यवस्था की चुनौतियां भी हैं। कई जगहों पर अफवाहों और जमाखोरी ने भी समस्या को और बढ़ा दिया। जब लोगों को लगता है कि सिलेंडर नहीं मिलेगा, तो वे जरूरत से ज्यादा खरीदने की कोशिश करते हैं और इससे संकट गहरा जाता है। प्रशासन ने राज्यों को निर्देश दिया है कि कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्त नजर रखी जाए। लोगों से भी अपील की जा रही है कि अफवाहों पर भरोसा न करें और जरूरत के अनुसार ही सिलेंडर लें।

यह भी सच है कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सामरिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण, गैस पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार और एलएनजी टर्मिनलों की संख्या बढ़ाना इसी दिशा में किए गए प्रयास हैं। इनका उद्देश्य यही था कि वैश्विक संकट की स्थिति में देश पूरी तरह असहाय न रहे। आज का एलपीजी संकट हमें एक बड़ा सबक भी देता है। जब तक ऊर्जा के लिए हम बाहरी स्रोतों पर अधिक निर्भर रहेंगे, तब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाले युद्ध या संकट का असर भारत पर पड़ेगा। इसलिए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना समय की जरूरत है।

फिलहाल सबसे जरूरी है संयम और सहयोग। संकट के समय सरकार, प्रशासन, विपक्ष और समाज, सभी की जिम्मेदारी बनती है कि समस्या के समाधान की दिशा में काम करें। आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है कि व्यवस्था को मजबूत किया जाए और आम लोगों की परेशानी को कम किया जाए। भारत ने पहले भी कई बड़े संकटों का सामना किया है और उनसे बाहर निकलने का रास्ता भी खोजा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह स्थिति भी जल्द सामान्य होगी और लोगों की रसोई फिर से बिना चिंता के जलती रहेगी।

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