मोबाइल और इंटरनेट का अनियंत्रित उपयोग युवाओं की एकाग्रता, मानसिक संतुलन और उत्पादकता के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में आयोजित “फाइटिंग डिजिटल एडिक्शन” कार्यक्रम में जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि डिजिटल युग में तकनीक का संतुलित उपयोग ही सफलता की कुंजी है और आने वाले समय में व्यक्ति की काबिलियत उसके डिजिटल व्यवहार से भी आंकी जाएगी।
जिलाधिकारी ने यह भी कहा कि बीसवीं शताब्दी में काबिलियत का पैमाना आईक्यू (इंटेलिजेंस क्वोशेन्ट) था। इक्कीसवीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ईक्यू (इमोशनल क्वोशेन्ट) का महत्व बढ़ा,
उन्होंने कहा कि आज का समय अटेंशन इकॉनमी का है, जहां बड़ी तकनीकी कंपनियां लोगों का ध्यान अपने प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए मनोविज्ञान और तकनीक दोनों का इस्तेमाल कर रही हैं। भारत में लगभग 97 करोड़ इंटरनेट/मोबाइल कनेक्शन होने के कारण मोबाइल फोन इस व्यवस्था का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है।
जिलाधिकारी ने युवाओं से कहा कि तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि डिजिटल अनुशासन विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने हाल ही में घोषित सिविल सेवा परीक्षा परिणाम का उदाहरण देते हुए कहा कि सफल अभ्यर्थियों में एक समानता यह रही कि उन्होंने तैयारी के दौरान मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखी।
कार्यक्रम में पारुल राजोरिया, डॉ. संदीप सिंह, क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रियंका शुक्ला, डॉ. अनमोल श्रीवास्तव, सृजन श्रीवास्तव, दुर्गा यादव, अहमद अब्दुल्ला और आशीका मिश्रा सहित अन्य विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
डिजिटल लत के संकेत
बिना कारण बार-बार मोबाइल चेक करना
थोड़ी देर के लिए फोन खोलकर घंटों ऑनलाइन रह जाना।
पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान बार-बार मोबाइल की ओर जाना
मोबाइल दूर होने पर बेचैनी या चिड़चिड़ापन महसूस होना
देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद प्रभावित होना
परिवार और मित्रों के साथ समय कम बिताना
आंखों में जलन, सिरदर्द या गर्दन-पीठ में दर्द की समस्या
सोशल मीडिया देखने के बाद तनाव या तुलना की भावना बढ़ना
ऑफलाइन गतिविधियों और शौक में रुचि कम होना
मोबाइल कम करने की कोशिश के बावजूद उपयोग नियंत्रित न कर पाना
दिलीप मिश्रा की रिपोर्ट



















