मलवा। विकास की असली तस्वीर तब दिखाई देती है, जब उसका लाभ सीधे आम लोगों और स्थानीय कारोबार तक पहुंचे। कानपुर-प्रयागराज राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित मलवा का प्रसिद्ध मोहन पेड़ा इसकी एक मिसाल बनकर सामने आया है।
वर्ष 1965 में एक छोटी-सी दुकान से शुरू हुआ यह सफर आसान नहीं था। उस समय कानपुर-प्रयागराज मार्ग सिंगल लेन था। सड़क संकरी थी, वाहनों की संख्या कम थी और दुकान पर आने वाले ग्राहक भी गिने-चुने होते थे। परिवार मेहनत करता था, लेकिन कारोबार सीमित था।
समय बदला और राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण का कार्य शुरू हुआ। सिंगल लेन सड़क आधुनिक सिक्स लेन हाईवे में बदल गई। बेहतर सड़क, तेज़ सफर और बढ़ती आवाजाही ने मलवा को नई पहचान दी। इसी के साथ मोहन पेड़ा की दुकान पर भी ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ने लगी।
आज सुबह होते ही दुकान पर लोगों की भीड़ लग जाती है। कई यात्री अपनी यात्रा की शुरुआत यहां के ताज़ा पेड़े से करते हैं, तो कई लोग लौटते समय अपने साथ डिब्बों में पैक कराकर इसे ले जाना नहीं भूलते। स्वाद और गुणवत्ता ने मोहन पेड़ा को केवल मलवा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे देशभर के यात्रियों के बीच लोकप्रिय बना दिया।
बढ़ती मांग के साथ कारोबार ने भी रफ्तार पकड़ी। परिवार ने मोहन पेड़ा की कई नई शाखाएं शुरू कीं। कारोबार बढ़ने से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए। हलवाई, बिक्री कर्मचारी, पैकिंग स्टाफ और परिवहन से जुड़े कई लोगों को काम मिलने लगा।
स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि बेहतर सड़क संपर्क ने पूरे क्षेत्र के व्यापार को नई ऊर्जा दी है। मोहन पेड़ा की सफलता इस बात का उदाहरण है कि मजबूत बुनियादी ढांचा केवल सफर को आसान नहीं बनाता, बल्कि छोटे कारोबारों को बड़े ब्रांड बनने का अवसर भी देता है।
आज मोहन पेड़ा सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि मलवा की पहचान, स्थानीय उद्यमिता की सफलता और बदलते भारत की एक प्रेरक कहानी बन चुका है।
देवेश तिवारी की रिपोर्ट



















