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जिस रास्ते पर आज दौड़ते हैं हजारों वाहन, उसी धरती ने देखी थी आजादी की लड़ाई

 

आज कानपुर से प्रयागराज के बीच जिस NH-19 पर दिन-रात हजारों वाहन फर्राटा भरते हैं, वह सिर्फ एक हाईवे नहीं है। इस सड़क के आसपास की मिट्टी में आजादी की लड़ाई की कई ऐसी कहानियां दफन हैं, जिन्हें शायद आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम भूलते जा रहे हैं।
कानपुर, फतेहपुर और प्रयागराज को जोड़ने वाला यह इलाका अंग्रेजी शासन के दौर में भी बेहद महत्वपूर्ण था। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान इसका असर शहरों के साथ-साथ गांवों और कस्बों में भी दिखाई दिया।
कानपुर के नरवल और आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन ने जोर पकड़ा। अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के बाद आंदोलनकारियों ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद की।
स्थानीय इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक, 23 अगस्त 1942 की रात अंग्रेजी शासन से जुड़ी एक स्थानीय कोठी पर हमला कर उसे आग के हवाले किए जाने की घटना भी इसी दौर के आक्रोश की बड़ी मिसाल मानी जाती है। यानी जिस इलाके में आज गाड़ियों की रफ्तार दिखाई देती है, कभी वहीं आजादी के नारों और आंदोलन की गूंज सुनाई देती थी।
देश आजाद हुआ और नरवल समेत पूरे इलाके में तिरंगा फहराकर आजादी का जश्न मनाया गया। यह उन तमाम आंदोलनकारियों के संघर्ष के सपने के पूरा होने का पल था, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत का सामना किया था।
आज वही रास्ता आधुनिक छह लेन NH-19 का हिस्सा है। बेहतर कनेक्टिविटी ने कानपुर, फतेहपुर और प्रयागराज के बीच सफर को आसान बना दिया है। लेकिन विकास की इस रफ्तार के बीच इतिहास की वह विरासत भी मौजूद है, जिसे याद रखना जरूरी है।
सवाल सिर्फ इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि उन स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों की सुध लेने का भी है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।
NH-19 आज विकास की रफ्तार का प्रतीक है… लेकिन इसकी मिट्टी आज भी उस संघर्ष की गवाही देती है, जिसने हमें आजाद भारत दिया।

देवेश तिवारी की रिपोर्ट

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