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गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है, जब कि संत सद्भाव में जीते हैं

कानपुर,गृहस्थ जीवन में मनुष्य तनाव में जीता है, जब कि संत सद्भाव में जीते हैं। यदि संत नहीं बन सकते तो संतोषी बन जाओ।संतोष सबसे बड़ा धन है।यह बात श्रीमद्भागवत कथा के पांचवे दिन चन्द्रेश महाराज उर्फ चन्द्रदास ने की। उन्होंने भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का वर्णन करते हुए कहा कि कृष्ण के पैदा होने के बाद कंस उसको मौत के घाट उतारने के लिए अपनी राज्य की बलवान राक्षसी पूतना को भेजता है।पूतना वेष बदलकर भगवान श्री कृष्ण को अपने स्तन से जहरीला दूध पिलाने का प्रयास करती है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण उसको मौत के घाट उतार देते हैं। उसके बाद कार्तिक माह में ब्रजवासी भगवान इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए पूजन का कार्यक्रम करने के की तैयारी करते हैं। भगवान कृष्ण उनको इन्द्र का पूजन करने से मना करते हुए गोवर्धन महाराज की पूजन करने की बात कहते हैं। जिसपर इन्द्र श्रीकृष्ण की बातों को सुनकर क्रोधित हो जाते हैं और तेज जलवृष्टि शुरू करते हैं। जिसे देखकर समस्त ब्रजवासी परेशान हो जाते हैं। भारी वर्षा को देख भगवान श्री कृष्ण गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर पूरे नगरवासियों को पर्वत के नीचे बुला लेते हैं। अंत में हार मानकर इन्द्र एक सप्ताह के बाद बारिश को बंद कर देते हैं। जिसके बाद ब्रज में भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन महाराज के जयकारें लगने लगते हैं। गोवर्धन पूजा पर भगवान को छप्पन भोग लगाया गया। इस मौके पर बिटोला देवी शुक्ला,लक्ष्मी नारायण शुक्ल, बबली शुक्ला, उपेंद्र त्रिपाठी उर्फ छान, आचार्य संजीव द्विवेदी, अचार्य विजय बाजपेई, गौरव मिश्रा, पूर्वा शुक्ला, पार्थ, सूर्या, सागर पांडेय, मानस पांडेय, रहे।

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