चकेरी – मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन के साथ ही दस दिनों के दशहरा पर्व का समापन हो गया। बुधवार को शहर की सड़कों पर ढोल – बाजे के साथ माता रानी के जयकारे लगाते भक्तों का काफिला जाजमऊ के सिद्धनाथ घाट पंहुचा। मां दुर्गा की प्रतिमा को सिद्धनाथ घाट स्थित विसर्जन स्थल पर विसर्जित किया गया। नौ दिनों की पूजा के बाद दशहरे के दिन मां दुर्गा पृथ्वी से अपने लोक वापस जाती हैं। इसलिए दशहरे के दिन मां की प्रतिमा के साथ – साथ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। पूजा के बाद देवी-देवताओं की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया गया। हिन्दू धर्म में जल को बहुत पवित्र माना जाता है। जल की पवित्रता के कारण ही देवी- देवताओं की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जल ब्रह्म का ही स्वरूप है। जब सृष्टि का निर्माण नहीं हुआ था, तब यहां केवल जल ही जल था और माना जाता है कि सृष्टि के अंत में केवल जल ही जल होगा। जल को बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। वरुण देव जल के स्वामी हैं और विष्णु जी के अंश हैं। पुराणों के अनुसार जल से ही सभी देवी-देवताओं तथा सृष्टि का निर्माण हुआ है। इसलिए आदि अनंत भगवान विष्णु को देवी-देवताओं की मूर्तियां समर्पित कर दी जाती हैं।
गंगा नदी के सिद्धनाथ घाट मे शुक्रवार को दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए बने स्थल में गंदा पानी भरा होने की कारण श्रद्धालुओं मे प्रशासन के प्रति निराशा रही। सिद्धनाथ घाट मे मूर्ति विसर्जन के लिए स्थल मे शौचालय का गन्दा व बदबूदार पानी भर रहा जिससे दुर्गंध से एक पल भी खड़े रहना दूभर था। लोगो ने मजबूरन दूषित पानी मे विसर्जन किया।
Editor In Chief-Naresh Singh


















