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एशिया का सबसे बड़ा जुलूस-ए-मोहम्मदी कानपुर जाजमऊ से निकला, लाखों ने मिलकर मनाई ईद-ए-मिलादुन्नबी

कानपुर,
पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद साहब के जन्मदिवस ईद-ए-मिलादुन्नबी की खुशियों में शुक्रवार को कानपुर से एशिया का सबसे बड़ा जुलूस-ए-मोहम्मदी जोहर की नमाज के बाद निकाला गया।
सबसे आगे जमीयत उलमा के सदस्य रहे, जबकि उनके पीछे तंजीमें हाथों में हरे झंडे और लाउडस्पीकर पर नात पढ़ते हुए शामिल हुईं। जगह-जगह स्टेज बनाकर विभिन्न संगठनों और धर्मों के लोगों ने जुलूस का स्वागत किया।

जुलूस में शामिल अनुयायी “या रसूल अल्लाह” के नारे लगाते और पैगंबर-ए-इस्लाम की शान में नात पढ़ते चल रहे थे। जैसे-जैसे जुलूस आगे बढ़ता गया, लोगों की भीड़ बढ़ती चली गई। अनुमान है कि इस साल भी करीब दो लाख से अधिक लोग इसमें शामिल हुए।

करीब 5 किलोमीटर लंबा यह जुलूस मदरसा शाह आला कुदर्टियां से शुरू हुआ राज रानी मैरिज लॉन, शीतला बाज़ार, अशरफ़बाद, पुरानी चुंगी, मोतीनगर, तेलमील चौराहा, सरय्या चौराहा 150 फिट वी आई पी रोड, नई चुंगी से होते हुए ईदगाह दादा मियां मज़ार पर संपन्न हुआ।

सौहार्द और भाईचारे की मिसाल

जुलूस-ए-मोहम्मदी केवल मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं रहा। इसमें बड़ी संख्या में हिंदू, सिख और ईसाई समुदाय के लोग भी शामिल हुए और स्वागत किया। शहरभर में गुलाब की पंखुड़ियों से जुलूस का अभिनंदन हुआ, जिससे माहौल और भी खुशनुमा बन गया।

110 साल पुराना इतिहास

इस जुलूस की नींव अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हुए आंदोलन से जुड़ी है। वर्ष 1913 में अंग्रेजों ने मेस्टन रोड पर मस्जिद मछली बाजार का वुजूखाना तोड़ दिया था, जिससे हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय नाराज हो गए। अगले वर्ष 1914 में 12 रबी उल अव्वल के दिन परेड ग्राउंड से एकजुट होकर लोगों ने जुलूस निकाला, जो धीरे-धीरे जुलूस-ए-मोहम्मदी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

तब से हर साल यह परंपरा जारी है और आज यह जुलूस एशिया का सबसे बड़ा जुलूस माना जाता है।
क़ारी हसीब अख्तर ने बताया कि यह जुलूस केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एकता, भाईचारे और अंग्रेजों के खिलाफ साझा संघर्ष की याद भी है।

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