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नौ अज्ञात अस्थि कलशों का भू विसर्जन अपनों ने भुलाया पर गैरों ने दिलाया मोक्ष अस्थि कलश बैंक की 11वीं वर्षगांठ

 

कानपुर , आज के भौतिकवादी समाज में जहां सामाजिक संबंध दरक रहे हैं वहीं परम्पराओं के पालन में भी उदासीनता देखी जा रही है, किसी व्यक्ति के निधन पर संपन्न होने वाले तेरह दिवसीय मरणोत्तर संस्कार अब कहीं कहीं पांच से सात दिन के बीच पूरे कर दिए जाते हैं, इसी प्रकार अब लोग कई बार अपने प्रियजनों का अस्थि कलश अस्थि कलश बैंक में रख कर भूल जा रहे हैं इन्हीं अज्ञात अस्थि कलशों का आज 14 दिसंबर को भैरो घाट पर पूर्ण शास्त्रोक्त विधि से भू विसर्जन किया गया, शारदीय पितृपक्ष की दशमी तिथि को किया गया विसर्जन
कम लोगों को ज्ञात होगा कि जिस प्रकार शारदीय नवरात्रि से पूर्व पितृपक्ष पड़ता है ठीक उसी प्रकार दिसंबर माह में गुप्त शारदीय पितृपक्ष आता है जिसमें साधक अपनी विशिष्ट साधनाएं करते हैं,
कार्यक्रम का प्रारंभ अस्थि कलश बैंक के संस्थापक मनोज सेंगर एवं मुख्य अतिथि महालक्ष्मी नंद गिरि मंगलमुखी मन्नत मां द्वारा कलशों का पूजन करते हुए किया गया, विशिष्ट अतिथि गंगा प्रहरी पंडित रामजी त्रिपाठी, पंडित विजय नारायण तिवारी मुकुल, पंडित शेषनारायण त्रिवेदी पप्पू भैया एवं पंडित महेंद्र पाण्डेय पप्पू जी ने कलशों का रोली, अक्षत, पान, सुपाड़ी, कलावा, पुष्प, गंगाजल से विधिवत अभिषेक किया, वरेण्य अतिथि डॉ प्रदीप दीक्षित एवं डॉ वी सी रस्तोगी ने अस्थि कलश बैंक की 11वीं वर्षगांठ पर पूजन अर्चन किया, शरद प्रकाश अग्रवाल एवं उमाकांत जी ने अतिथियों का स्वागत किया, मंगला मुखी प्रमुख मन्नत मां एवं उनके साथ आई नीहारिका, सारिका, वैशाली, रेनू का अंगवस्त्र अलंकरण माधवी सेंगर ने किया, संजय भारती और शांति भूषण यादव का विशेष सहयोग रहा, सभी अतिथियों ने कलशों को विद्युत शवदाह गृह के पीछे खोदे गए गड्ढे में जौ, तिल, अक्षत, दूध, दही, गंगाजल एवं पुष्पों से अभिषेक करते हुए विसर्जन किया,
क्या है अस्थि कलश बैंक
अस्थि कलश बैंक विद्युत शवदाह गृह भैरोघाट में स्थित वह स्थान है जहां अपने दिवंगत स्वजन की अस्थियों को लोग कुछ समय रख
सकते हैं जिन्हें बाद में अपने इच्छित स्थान पर विसर्जन हेतु ले जा सकें,
अस्थि कलश बैंक की स्थापना वर्ष 2014 में देहदान अभियान प्रमुख मनोज सेंगर द्वारा की गई,
यहां बैंक के लॉकर जैसे बॉक्स बने हैं जिसमें अस्थि कलश रख दिए जाते हैं, समस्त व्यवस्था निःशुल्क है,
क्यों बच जाते हैं अस्थि कलश
इस अनूठे प्रकल्प के संस्थापक मनोज सेंगर बताते हैं कि भारतीय समाज में प्रायः कोई भी व्यक्ति अपने स्वजन के अस्थि कलश को छोड़ना नहीं चाहता परंतु कई बार परिवार में कोई बड़ी दुर्घटना होने अथवा किसी आपदा जैसे बाढ़ अथवा अग्निकांड की स्थिति में रखे हुए कलश की सुधि बिसर जाती है,
कई बार कुछ व्यक्तियों का दाह संस्कार मोहल्ले वाले मिल कर करते हैं ऐसी स्थिति में कलश रख तो दिया जाता है पर उसे लेने वाला कोई नहीं होता,
बचे हुए कलश आमतौर पर वही होते हैं जिनका कोई परिजन नहीं होता और पड़ोस के लोग विद्युत शवदाह गृह में संस्कार कर देते हैं,
इस प्रकार के अस्थि कलश जिन्हें लेने छः माह तक कोई नहीं आता उन्हें अलग रख दिया जाता है और
वर्ष के अंत में उनका विधिवत भू विसर्जन कर दिया जाता है।

दिलीप मिश्रा की रिपोर्ट

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